भईया खबरीलाल

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भईया खबरीलाल के साथ “आस्था के 118 किमी सफर में ‘सेवा की चुस्की’: 100 वर्षो से राघु पिपलिया में चाय-भजिए से महक रहा श्रद्धा का पड़ाव!

उज्जैन। बाबा महाकाल की नगरी से आस्था की अलख जगाते हुए 118 किलोमीटर लंबी पावन पंचकोशी यात्रा का आगाज़ हो चुका है। ‘बम-बम भोले’ के जयकारों के बीच हजारों श्रद्धालुओं का कारवां आस्था-पथ पर बढ़ चला है। इस तपते सफर में जहां पैर छाले मांगते हैं, वहीं सेवा-भाव के ठिकाने हर थकान को हर लेते हैं।

*100 साल पुरानी परंपरा, आज भी उतनी ही ताज़ा*
यात्रा मार्ग पर जगह-जगह सेवा के रंग बिखरे हैं, लेकिन ग्राम राघु पिपलिया में पाटीदार समाज की सेवा सबसे खास है। कल्पना कीजिए – सुनसान रास्ता, थके कदम, और अचानक हवा में गरमा-गरम भजिए की खुशबू तैर जाए… साथ में कुल्हड़ वाली चाय की चुस्की। बस, सारी थकान पल में गायब!

पाटीदार समाज यहां पिछले लगभग 100 वर्षों से बिना रुके, बिना थके पंचकोशी यात्रियों की खातिरदारी कर रहा है। टेंट के नीचे भट्टी पर चढ़ी कढ़ाई, उसमें छन-छन कर रहे भजिए, बगल में भाप उड़ाती चाय और ठंडे पानी के मटके। श्रद्धालु जैसे ही यहां रुकते हैं, सेवादार हाथ जोड़कर कहते हैं – “पहले प्रसादी पाओ, फिर आगे बढ़ो।”

*”यह सेवा नहीं, हमारी श्रद्धा है” – सरपंच शिव पाटीदार*
ग्राम पंचायत राघु पिपलिया के सरपंच शिव पाटीदार गर्व से बताते हैं, “हमारे दादा-परदादा ने ये सेवा शुरू की थी। ये चाय-भजिए नहीं, बाबा महाकाल का प्रसाद है। पंचायत और पूरा पाटीदार समाज हर साल अपनी फसल की तरह इस सेवा को भी बोता है। यात्री का एक घूंट पानी पीकर ‘आशीष’ देना ही हमारा मेहनताना है।”

समाजसेवी काशीराम पाटीदार ने बताया कि 118 किमी का ये कठिन मार्ग सिर्फ पैरों से नहीं, सेवा की भावना से नपता है। राघु पिपलिया जैसे दर्जनों पड़ाव इस यात्रा की असली ताकत हैं। यहां धर्म जात-पात नहीं पूछता, बस पूछता है – “भूखे हो? थके हो? आओ, थोड़ा सुस्ता लो।”

पंचकोशी यात्रा का ये रंग बताता है कि उज्जैन सिर्फ मंदिरों की नगरी नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाली ‘सेवा-स्थली’ भी है। और जब श्रद्धा में भजिए की सोंधी खुशबू घुल जाए, तो सफर अपने आप पावन हो जाता है।